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25 Mar 2022

डायरी : शिक्षा कैम्प से

अंकित मौर्य 

 

हाल ही में शिक्षा-शिविर का हिस्सा बनने का मौक़ा मिला। सेवा मंदिर से जुड़ने से पहले से ही जब भी संस्था का नाम सुना, शिक्षा-शिविर का ज़िक्र भी साथ ही आया। आख़िर यह मामला है ही इतना दिलचस्प। कई दशकों से चलते आ रहे होने के बावजूद यह शिक्षा, और विशेष तौर पर वंचित तबक़ों की शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी नवाचार ही है। नवाचार इसलिए कह रहा हूँ कि इस तरह का मॉडल कहीं आसपास या दूर-दराज़ में और चल रहा हो, ऐसा सुनने को नहीं मिलता। अति-संक्षेप में शिक्षा-शिविर का परिचय कुछ यूँ है कि रोज़मर्रा के क्रियाकलापों और ज़िम्मेदारियों से निकाल कर बच्चों को सेवा मंदिर संचालित मोहन सिंह मेहता प्रशिक्षण केंद्र, काया में एकत्रित किया जाता है और फिर 60 दिन तक बच्चे शिक्षण और इससे सम्बंधित गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और सीखने-सिखाने की क्रिया दिनभर चलती रहती है। एक वर्ष में एक बैच के साथ ऐसे तीन शिविर आयोजित किये जाते हैं।

मेरी राय में हम सभी को कभी ना कभी इस कैम्प का हिस्सा अवश्य ही बनना चाहिए। मुझे ऐसा लगने के अनेक कारणों में से कुछ आपके साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ। कैम्प सुबह के सूरज के साथ ही 6 बजे उठता है और इसकी शुरुआत छोटी-छोटी क़तारों में हाथ मुँह धोने जाते बच्चों और शिक्षकों से होती है। अगर आप इस वक़्त बाहर निकलें तो सुबह का आलस तोड़ती गिलहरियाँ, पहला चुग्गा लेने निकली चिड़ियाँ, अलसाए हुए कुत्ते, छोटे से पहाड़ के पीछे से आँखें मींचता चला आ रहा सूरज नज़र आता है। काया प्रशिक्षण केन्द्र पर सुबह होने की ख़बर मुर्ग़े की बाँग से नहीं, बल्कि मोरों की आवाज़ से मिलती है और अगर आपकी क़िस्मत तेज़ है तो क़तार में उड़ते मोर-मोरनियाँ भी सुबह देखने को मिलते हैं।

 7-8 के समय में बच्चे हल्का-फुल्का व्यायाम और योगासन करते हैं और इसके बाद नाश्ता करने चले जाते हैं। नाश्ते के बाद सब प्रार्थना के लिए एकत्रित होते हैं और पाँच-छः क़तारों में खड़े बच्चे सूरज से निकलती किरणों से नज़र आते हैं। ये सब देख कर मन अपने आप उन दिनों में चला जाता है जब हम क़तार में खड़े बच्चे थे और एक आँख खोलकर अग़ल-बग़ल चल रही गतिविधियाँ देखा करते थे। कोई टीचर हमारी तरफ़ देखता हुआ दिख जाता था तो बिजली की तेज़ी से आँखें बंद हो जाती और पीठ सीधी। यहाँ बच्चों में वो डर नहीं दिखता। जिसका मन है उसने दोनों आँखें बंद की, जिसका मन किया वो दोनों आँखें खोल कर खड़ा है। शिक्षा-शिविर से उन बच्चों को जोड़ा जाता है जिन्होंने या तो ज़िम्मेदारियों के चलते स्कूल छोड़ा होता है या स्कूल में सीखने का सही माहौल ना मिलने से और पढ़ाई में पिछड़ने से हतोत्साहित होकर स्कूल जाना बंद कर चुके होते हैं। ऐसे में यहाँ यह प्रयास किया जाता है कि उन बच्चों को उनकी आयु के अनुसार लर्निंग लेवल तक लाया जाए ताकि जब पुनः उनका दाख़िला करवाया जाए तो ये बच्चे अपनी पढ़ाई उसी स्तर से शुरू कर सकें जहाँ उनके बाक़ी साथी हैं।

 हाल में ही देखी एक फ़िल्म में कई बार एक डायलॉग आया, "हम खेलना इसलिए नहीं बंद करते कि हम पर उम्र हावी हो जाती है, हम पर उम्र इसलिए हावी हो जाती है क्योंकि हम खेलना बंद कर देते हैं"। कैम्प में जाने पर इन पंक्तियों का अहसास बहुत ही जीवंत तरीक़े से होता है। कैम्प में खेलने के दो सत्र हैं, एक दिमाग़ी कसरत का और एक शारीरिक का। दिमाग़ी कसरत होती है ऐक्टिविटी पीरियड में जब बच्चे तरह तरह के खिलौनों जैसे ज़ेंगा ब्लॉक्स, टिक-टैक-टो, स्क्रैबल, वाक्य बनाओ आदि रणनीति और समझ के साथ खेले जाने वाले खेल खेलते हैं। इस समय कमरा बच्चों की आँखों की चमक से ही रोशन हो रखा होता है। बाहर से आए लोग जैसे कि मैं उस समय था, जब बच्चों के साथ खेलने पहुँचते तो उनका जोश दुगुना हो जाता है। और फिर 4-5 के बीच शारीरिक खेल होते हैं। बड़ों के साथ मिलकर खेलते हुए बच्चों में संयम और प्रतियोगिता की भावना, दोनों ही देखने को मिलते। यहीं मैं सोनाराम और बिंदु से मिला। जहाँ सोनाराम अपनी 4 फ़ीट की ऊँचाई के साथ वॉलीबॉल के सबसे दक्ष खिलाड़ियों में से एक है वहीं बिंदु को ज़ेंगा खेलते हुए देखना अपने आप में एक अनुभव है। एकटक ठहरी हुई आँखों और उँगलियों पर ग़ज़ब के कंट्रोल के साथ बिंदु ज़ेंगा ब्लॉक निकालती और टॉवर के ऊपर जमाती, वहीं सोनाराम सर्विस करने से पहले मैदान पर एक तेज़ नज़र डालता और ख़ाली जगह या नए खिलाड़ी के पास गेंद पहुँचा देता। सामने से चाहे कितनी भी तेज़ वॉलीबॉल आ रही हो, सोनाराम बिना डरे उसे उठाता और पार करा देता।

शिक्षा-शिविर पर एक चर्चा के दौरान मेरे सहकर्मी और अनेक शिविरों के संचालक विकास भट्ट ने कहा था कि हम कोशिश तो यही करते हैं कि कैम्प से जुड़े सारे बच्चे यहाँ से जाकर वापस स्कूल से जुड़ें और अपनी पढ़ाई पूरी करें, पर इतने सालों के अनुभव के साथ हमें पता है कि पूरी तरह ऐसा नहीं होगा। कुछ बच्चे एक-दो साल में वापस स्कूल छोड़ देंगे तो कुछ यहाँ से जाने के बाद स्कूल से जुड़ेंगे ही नहीं। कुछ रोज़गार की तलाश में पलायन भी करेंगे। ऐसे में हमारी कोशिश यहाँ यह रहती है कि विषय अनुसार शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को सीखने का तरीक़ा भी सिखाया जाए। यहाँ की पढ़ाई में अपनी अभिव्यक्ति तराशने के अनेकों मौक़े बच्चों को दिए जाते हैं। कम्प्यूटर शिक्षा, पुस्तकालय, ऐक्टिविटी कक्ष और सांस्कृतिक कार्यक्रम उसी कोशिश का एक हिस्सा हैं।

कैम्प की शाम भी सुबह की ही तरह ठंडी हवाओं से लिपटी हुई और बच्चों की चहलक़दमी से भरी हुई होती है। कमरों से बच्चों के गानों की आवाज़ें आ रही होती हैं और शिक्षक और बच्चे अंग्रेज़ी राइम्ज़ की धुन पर नाच रहे होते हैं। चिड़ियों की आवाज़ थमने लगी होती है और इधर-उधर टिमटिमाते जुगनू नज़र आने लगते हैं। किचन की तरफ़ से खाने और रोटियों पर लग रहे घी की ख़ुशबू उठ रही होती है। पीछे की तरफ़ के पहाड़ जिसपर पूरा दिन चरते हुए जानवर नज़र आते हैं, अब ख़ाली हो चुके होते हैं। एक लम्बे दिन के बाद शिक्षा-शिविर अब ख़ुद को समेटने की तैयारी करता नज़र आ रहा होता है। कैम्प में आपको दीपक जैसे शिक्षक मिलत्ते हैं जो पहले ख़ुद बच्चे के तौर पर शिविर से जुड़ चुके हैं। उनकी बातों में उनके जीवन पर पड़े शिविर के सकारात्मक प्रभाव और कोटड़ा में बदल रहे शिक्षा के माहौल की बातें सुनायी देती है। कैम्प में आप इल्तिज़ा, अरुणा, समृत और जयंतीलाल जैसे शिक्षकों से मिलते हैं जो अपने मृदुल व्यवहार और सौम्य आवाज़ से कैम्प को बाँधे रखते हैं। कैम्प में आपसे मिलते हैं वजाराम, प्रियंका, कमला जैसे शिक्षकों से जिनकी ऊर्जा शिविर को आगे बढ़ाती है। वर्तमान में इन सबका नेतृत्व कर रहे हैं छतर सिंह जी जिन्होंने कई शिविरों का सफल नेतृत्व किया है। 

ये तो है एक झलक शिविर में बीते मेरे एक हफ़्ते की। जब भी ये संयोग बैठे की कैम्प भी चल रहा हो, और आपके पास वक़्त हो, कोशिश करें कि आप कैम्प से जुड़ पाएँ। वहाँ के शिक्षक और बच्चे आप से बहुत कुछ तो सीखेंगे ही, आप भी ख़ाली हाथ नहीं लौटेंगे। बहुत कुछ भी नहीं तो भी फ़ुर्सत के कुछ पल, कुछ अच्छी यादें और झोला भर मुस्कुराहटें भी कुछ कम तो नहीं।  

 

 

 

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